Thursday, June 10, 2010

बन्दर बाबू

बन्दर बाबू सबके घर में ,
बिन पूछे घुस जाते हैं  |
जो भी देखें पड़ा सामने ,
ले चम्पत हो जाते हैं  |
एक दिवस चाचा जी की ,
पिस्तौल टँगी थी खूँटी  पर |
चुपके से पिस्तौल उठाकर ,
ले भागे  छत के ऊपर  |
बन्दर बाबू खेल रहे थे  ,
उसे खिलौना समझे थे |
इधर घुमाते ,उधर घुमाते ,
उसमे ही वह उलझे थे  |
तभी अचानक गोली चल गयी ,
धांय- धांय करके आवाज   |
भला ,निशाना चूक गया ,
नहिं,बन्दर बाबू मरते आज  | 

3 comments:

  1. भावों को इतनी सुंदरता से शब्दों में पिरोया है
    सुंदर रचना....

    Sanjay kumar
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. आप का ह्र्दय से बहुत बहुत आभार ! इसी तरह समय समय पर हौसला अफज़ाई करते रहें ! धन्यवाद !

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